मनु शरद

ज़िंदगी की सरजमीं पर...

मनु शरद

पलक झपकते ही!!!

गुज़र रहे थे उस गली,जो थी वीरान पड़ी,सामने थी वो खड़ी,अकस्मात् देख उसे,हमने पूछा कौन हो,वो बोली…ज़िंदगी!हमने कहा किसकी?वो बोली…तुम्हारी… हाथ पैर कांपने लगे,सिहरन सी …

मुआ’शरा(समाज)!!!

सुबह से रात बीच शाम होती है,ज़िंदगी ख़बरों में तमाम होती है, वक़्त की मियाद तय है आख़िर,फ़िज़ूल ख़र्ची देख हैरान होती है, हां हैं …

नफ़ासत!!!

क्या ख़ूब सोचकर भेजी ज़िंदा वो तस्वीर,मुहब्बत की जीती जागती उम्दा वो तस्वीर, बे इंतेहा तड़प के साथ ये कह रही तस्वीर,हर सितम पर मुस्कुराती …

क्या फ़ायदा!!!

करने लगे सजदा,धीमे से आवाज़ आई,ऊपरवाला ऊपर रहता,उठ खड़े हुए फ़ौरन,दोनों हाथ उठा कर,मांगने लगे दुआ… चल रहा रतजगा,कर्कश ध्वनि में,चीख चीख बताते व्यथा,हो हल्ला …

चेतनात्मक मंथन!!!

सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच रह कर मध्यमवर्गीय समूहों की विवेचनात्मक अवस्था चरमराती सी दिखती है.…मगर ऐसा है नहीं…इक नई चेतना अपने पैर पसार रही है …

दर्जन भर दर्द!!!

दर्जनों में दर्द,सैकड़ों में ख़ुशी,जो कुछ बची,ज़िंदगी ही होगी… आसमाँ बिछा कर,चादरें समेट लीं,पैर पसारने की,जगह नहीँ छोड़ी… पी गये हैं दरिया,समंदर है बाक़ी,छोटे से …